जिला अस्पताल बना “खुली हिंसा का मंच”: चोरी के शक में गरीब युवक की पिटाई, पुलिस चौकी बनी मूकदर्शक……

सतना। जिला अस्पताल में एक गरीब युवक को चोरी के संदेह में खुलेआम डंडों, लात-घूंसों से बेरहमी से पीटा गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि घटना के 24 घंटे बाद भी न तो पीटने वालों की पहचान हो पाई है और न ही कोई एफआईआर दर्ज की गई है। इस मामले ने पूरे जिले में अस्पताल प्रशासन और संबंधित थाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालों की बौछार कर दी है।
स्थानीय लोगों में आक्रोश है कि जिला अस्पताल में बने पुलिस चौकी की उपस्थिति के बावजूद किसी को भी कभी भी मारा-पीटा जा सकता है और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगती। लोगों का कहना है कि पुलिस केवल छोटी-मोटी कार्यवाहियों को बढ़ा-चढ़ाकर सोशल मीडिया में प्रचारित कर वाहवाही लूटने में लगी रहती है, लेकिन जब असल में जरूरत होती है तब या तो आंखें मूंद ली जाती हैं या हाथ बांधकर बैठा जाता है।
चर्चा है कि थाना स्तर के अधिकारी केवल नगर भ्रमण या तलाशी अभियान की फोटोज सोशल मीडिया में डालने को ही असली ‘कार्यवाही’ मानते हैं। थाने के कई कर्मचारी कार्रवाई से ज्यादा कैमरे के सामने सक्रिय रहते हैं। ऐसे में जब अस्पताल जैसी संवेदनशील जगह पर भी सुरक्षा की यह स्थिति है तो आम जनजीवन की सुरक्षा कितनी मजबूत है, यह प्रश्नचिन्ह बन गया है।
अस्पताल से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अस्पताल परिसर में मौजूद पुलिस चौकी में तैनात कर्मचारी सुरक्षा के बजाय निजी ‘दरबार’ और दलाली में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। मरीज को भर्ती कराना हो, किसी का खून जुटवाना हो, मृत्यु प्रमाण पत्र या जन्म प्रमाण पत्र बनवाना हो—सभी कार्यों में व्यक्तिगत स्वार्थ पहले, कानून और व्यवस्था बाद में।
इस घटना ने प्रशासन की निष्क्रियता और अस्पताल सुरक्षा की पोल खोल दी है। लोग सवाल कर रहे हैं—अगर कल को कोई गंभीर हादसा या जानलेवा हमला हो जाए, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या जिला अस्पताल जैसी जगह भी अब सुरक्षित नहीं बची है? क्या गरीब की जान की कोई कीमत नहीं रही?
इस बर्बरता पर अब प्रशासन की चुप्पी और ज्यादा खतरनाक लग रही है।