सियासत में उलझा विकास: बजट सत्र बना रणभूमि: विकास पीछे, बयानबाजी आगे, कब जागेंगे जिम्मेदार?……

सतना। नगर निगम की बजट बैठक एक बार फिर विकास से ज्यादा सियासी खींचतान और आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बनकर रह गई। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 4 अरब 66 करोड़ 66 लाख रुपए का बजट परिषद की विशेष बैठक में हंगामे के बीच पास तो हो गया, लेकिन 19 करोड़ 66 लाख रुपए के घाटे ने शहर की आर्थिक स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बैठक का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब महापौर योगेश ताम्रकार ने मेयर इन काउंसिल द्वारा पहले लिए गए 10 प्रतिशत प्रॉपर्टी टैक्स वृद्धि के फैसले को ऐन मौके पर वापस लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों को चौंका दिया। महापौर ने सदन में बताया कि चालू वित्तीय वर्ष में करीब 26 करोड़ रुपए की राजस्व वसूली हो चुकी है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है, इसलिए टैक्स बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है।

हालांकि, इस दावे पर नेता प्रतिपक्ष रावेन्द्र सिंह मिथलेश ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि सदन को केवल वसूली का आंकड़ा बताया जा रहा है, लक्ष्य और वास्तविक स्थिति छिपाई जा रही है। उन्होंने राजस्व वसूली में पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा कि जितनी वसूली होती है, उतनी ही रकम सिस्टम में गुम हो जाती है।
बैठक के दौरान पार्षद निधि, सीवर लाइन, दूषित पेयजल और स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत समस्याओं पर भी तीखी बहस देखने को मिली। पार्षद अर्चना गुप्ता और अभिषेक तिवारी ने लंबित पार्षद निधि की फाइलों पर जवाब मांगा, जिस पर महापौर ने भी कमिश्नर शेर सिंह मीना को घेरते हुए फाइलों को तत्काल निपटाने के निर्देश दिए। हालांकि, कमिश्नर ने विकास कार्यों का हवाला देकर जवाब देने से किनारा किया, जिससे माहौल और गरमा गया।
स्थिति तब और बिगड़ गई जब सत्ता और विपक्ष के पार्षदों के बीच तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई। बहस इतनी तीखी हो गई कि सदन की गरिमा तार-तार होती नजर आई और अंततः स्पीकर राजेश चतुर्वेदी को सदन छोड़कर जाना पड़ा।
शहरवासियों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गहरी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि पार्षदों और अधिकारियों के बीच आपसी टकराव और कथित गठजोड़ के चलते विकास कार्य ठप पड़ गए हैं। शहर की मूलभूत समस्याएं जस की तस हैं, लेकिन जिम्मेदार आपसी विवादों में उलझे हैं।
अब बड़ा सवाल यही है, क्या सतना का विकास यूं ही सियासत की भेंट चढ़ता रहेगा, या जिम्मेदार समय रहते जागकर शहर को नई दिशा देंगे?
निगम में नियुक्तियों पर भी बवाल: पार्षद प्रवीण सिंह ने खोला मोर्चा, आयुक्त पर गंभीर आरोप। नगर निगम परिषद की बैठक में आज उस समय माहौल गरमा गया, जब वार्ड 37 की पार्षद श्रीमती प्रवीण आशुतोष सिंह ने आयुक्त शेर सिंह मीणा के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नियम विरुद्ध नियुक्तियों और प्रभार वितरण पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि एक अयोग्य एवं कथित रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त उपयंत्री सुलभ पाठक को नियमों की अनदेखी कर कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभागों की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।पार्षद ने सदन में स्पष्ट कहा कि सुलभ पाठक का मूल पद मैकेनिकल इंजीनियर का है, जबकि नगर निगम में पहले से ही सिविल इंजीनियरों की बड़ी संख्या मौजूद है। इसके बावजूद उन्हें भवन अनुज्ञा निरीक्षण जैसे महत्वपूर्ण दायित्व सौंपना नियमों के खिलाफ है। भूमि विकास नियमों के अनुसार इस पद के लिए सिविल इंजीनियर होना अनिवार्य है, लेकिन इसकी अनदेखी की गई।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुलभ पाठक को एक साथ कई बड़े प्रभार दिए गए हैं, जिनमें शहर के 45 वार्डों की भवन अनुज्ञा, अग्निशमन विभाग, पार्कों के सिविल निर्माण, बरदाडिह जोन के निर्माण कार्य और गीता भवन जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं। इतना ही नहीं, नगर निगम के वर्कशॉप शाखा की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर डाल दी गई है, जबकि पहले यह कार्य कई इंजीनियरों की देखरेख में होता था।पार्षद प्रवीण सिंह ने इसे जन सुरक्षा के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि अग्निशमन और भवन अनुज्ञा जैसे विभागों में अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति गंभीर लापरवाही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सुलभ पाठक द्वारा प्रभारी फायर अधिकारी रहते हुए कई बड़े संस्थानों को बिना पूर्ण मानकों के ही फायर एनओसी जारी कर दी गई।सदन में उन्होंने मांग उठाई कि इन सभी मामलों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि किन आधारों पर नियमों को दरकिनार कर यह प्रभार सौंपे गए।इस पूरे मामले ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं और अब देखना होगा कि जिम्मेदार इस पर क्या जवाब देते हैं।