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विद्वता बनाम भक्ति: प्रेमानंद महाराज और जगद्गुरु रामभद्राचार्य के बयानों से छिड़ी बहस…..

अमित मिश्रा/सतना।

19 साल की तपस्या बनाम संस्कृत की विद्वता…..

भक्ति ही असली चमत्कार या शास्त्रार्थ की विद्वता?

मथुरा-वृंदावन। संत समाज में इन दिनों जगद्गुरु रामभद्राचार्य और संत प्रेमानंद महाराज को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने हाल ही में एक चैनल को दिए बयान में प्रेमानंद महाराज को “विद्वान” और “चमत्कारी” मानने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने प्रेमानंद महाराज को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे संस्कृत श्लोकों का अर्थ सहजता से बता दें, तभी उन्हें चमत्कारी माना जा सकता है।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य के इस बयान ने संत समुदाय और भक्तों में चर्चा छेड़ दी है। हालांकि, प्रेमानंद महाराज के अनुयायी इसे विवाद नहीं, बल्कि उनकी भक्ति और जीवन शैली पर उठी एक शंका के रूप में देख रहे हैं।

प्रेमानंद महाराज: तप, त्याग और भक्ति का प्रतीक…….

प्रेमानंद महाराज पिछले 19 वर्षों से गंभीर किडनी रोग से पीड़ित हैं। दोनों किडनियां खराब होने के बावजूद वे रोजाना वृंदावन की परिक्रमा करते हैं और हर क्षण राधा रानी की भक्ति में लीन रहते हैं। यह दृढ़ संकल्प और भक्ति भाव उनके अनुयायियों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। भक्तों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति इतनी कठिन परिस्थितियों में भी भक्ति-पथ पर अडिग रहकर लाखों लोगों को प्रेरित कर रहा है, तो यह किसी शास्त्रीय बहस से कहीं बड़ा चमत्कार है।

रामभद्राचार्य का तर्क और प्रतिक्रिया

रामभद्राचार्य ने अपने बयान में कहा कि वे प्रेमानंद जी से कोई द्वेष नहीं रखते, बल्कि उन्हें “बालक के समान” मानते हैं। उनका मानना है कि चमत्कार वही कहलाता है जब कोई विद्वान शास्त्रों की गहराई से व्याख्या कर सके और संस्कृत श्लोकों का अर्थ सहजता से बता पाए। उन्होंने प्रेमानंद महाराज को चुनौती दी कि वे शास्त्रों पर चर्चा कर अपनी विद्वता सिद्ध करें।

अनुयायियों की प्रतिक्रिया……

प्रेमानंद महाराज के अनुयायी मानते हैं कि किसी संत की महानता केवल शास्त्रीय बहस से तय नहीं होती। भक्ति, त्याग, सादगी और जीवन का आदर्श व्यवहार भी किसी संत को चमत्कारी बनाता है। प्रेमानंद महाराज का जीवन स्वयं यह संदेश देता है कि शारीरिक कष्टों के बावजूद ईश्वर की भक्ति और सेवा में निरंतर लगे रहना ही सच्चा चमत्कार है।

भक्ति और विद्वता की अलग राहें…

धार्मिक विद्वानों का मानना है कि संत परंपरा में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जो गहन शास्त्रीय ज्ञान रखते थे, वहीं कई संत ऐसे भी हुए जिन्होंने साधना और भक्ति से ही लाखों लोगों के हृदय में स्थान बनाया।

लोगों की माने तो जगतगुरु रामभद्राचार्य का बयान निश्चित रूप से बहस का विषय है, लेकिन भक्तों के लिए प्रेमानंद महाराज का तप, त्याग और भक्ति ही उनका असली चमत्कार है। उनका जीवन यह साबित करता है कि संतत्व केवल शास्त्रार्थ से नहीं, बल्कि भक्ति और सादगी से भी सिद्ध होता है। यही कारण है कि प्रेमानंद महाराज आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदय में “चमत्कारी संत” के रूप में प्रतिष्ठित हैं।


भारत की संत परंपरा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने शास्त्रार्थ से नहीं, बल्कि भक्ति और साधना से लोगों के दिलों में स्थान बनाया। सूरदास, मीरा और तुलसीदास जैसे भक्त संतों की परंपरा में प्रेमानंद महाराज भी आज वही आदर्श जी रहे हैं।

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