सेवा की रोशनी या सियासत की चमक?…..
पार्ट-2… अमित मिश्रा/सतना।

जिले में बदलते चेहरों के बीच पार्टी कार्यकर्ता की खामोश पीड़ा…..
मंचों पर नए चेहरे, संगठन की मंशा पर भी उठ रहे नरम लेकिन गहरे सवाल !
सतना जिले में बीते वर्षों से राजनीति का एक नया दृश्य उभरता दिखाई दे रहा है, जहां सेवा और सियासत की रेखा धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है।
मुफ्त चिकित्सा शिविर, धार्मिक आयोजन, खेल-कूद, दौड़ और सामाजिक कार्यक्रमों की भरमार है। हर आयोजन में जनसेवा का संदेश दिया जा रहा है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि इन प्रयासों का उद्देश्य कितना सेवा है और कितना पहचान बनाना!
बीते कुछ वर्षों में कई नए चेहरे अचानक सक्रिय हुए हैं। शुरुआत में इन समाजसेवी बने नेताओं ने अपनी संस्थाओं के माध्यम से बड़े स्तर पर सेवा अभियान चलाए, स्वास्थ्य शिविर, मदद अभियान और जनकल्याण की पहल। उस समय लोगों को लगा कि कोई नई सोच के साथ समाज के लिए काम करने आया है। लेकिन समय बीतने के साथ इन अभियानों की दिशा और प्रभाव को लेकर चर्चाएं भी बढ़ने लगीं।
आज स्थिति यह है कि कई आयोजनों में व्यवस्था से ज्यादा प्रचार दिखाई देता है। और अधिकांश समाजसेवी भी नेता बन चुके हैं।
इसी बदलते माहौल में पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता की पीड़ा सामने आई है। उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि उन्होंने कभी पद या स्वार्थ के लिए संगठन का साथ नहीं दिया। वर्षों तक विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी के लिए काम किया, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं।
उनका कहना है कि पहले पार्टी/संगठन में समर्पण और निरंतरता को महत्व मिलता था, लेकिन अब पैसे, संसाधन और प्रदर्शन ज्यादा प्रभावी हो गए हैं। जो जितना दिखता है, वही आगे बढ़ता नजर आता है। जिनके पास साधन व पैसे हैं, वे मंचों पर भी हैं और खबरों में भी।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपनी चिंता नहीं, अब उम्र हो गईं…. लेकिन उन कार्यकर्ताओं व नेताओं की जरूर है जो वर्षों से जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। ऐसे लोग आज भी बिना किसी अपेक्षा के संगठन के लिए समर्पित हैं, लेकिन धीरे-धीरे पीछे छूटते जा रहे हैं। सतना में बाहरी चेहरों की बढ़ती मौजूदगी को लेकर भी चर्चा है। कई कार्यक्रमों में वही नए चेहरे प्रमुख भूमिका में दिखाई देते हैं, जबकि पुराने कार्यकर्ता भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
यह स्थिति कहीं न कहीं संगठन की मंशा और दिशा पर भी सवाल खड़े करती है! क्या बदलते समय के साथ प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं, या फिर संतुलन कहीं बिगड़ रहा है?
फिलहाल, जिले की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां सेवा, प्रदर्शन और समर्पण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। जनता सब देख रही है, और कार्यकर्ता भी………..!