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सेवा के बहाने सत्ता का सफर: सतना में नेताओं/नेत्रियों की बढ़ती सक्रियता पर उठते सवाल……..!

अमित मिश्रा/सतना।

मुफ्त इलाज, धर्म-कर्म, और समाज सेवा के नाम पर सजी राजनीतिक प्रयोगशाला….

पुराने कार्यकर्ता हाशिये पर……?

सतना जिले में इन दिनों एक नई किस्म की राजनीति तेजी से आकार लेती दिख रही है, चर्चा है कि जिले में ऐसे कई चेहरे बीते कुछ वर्षों से अचानक सक्रिय हो गए हैं, जिनका बीते समय तक यहां की ज़मीन से कोई खास जुड़ाव नहीं था। लेकिन अब वही लोग खुद को सतना का बेटा, बेटी, बहू जैसे रिश्तों में स्थापित करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। इन नेताओं की सक्रियता का अंदाज़ भी दिलचस्प है। कहीं मुफ्त चिकित्सा शिविर, कहीं एंबुलेंस सेवा, तो कहीं धार्मिक कार्यक्रम जैसे भागवत व अनुष्ठान आयोजन।

सब कुछ जनसेवा के नाम पर, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि इन आयोजनों में सेवा ज्यादा होती है या सियासत की तैयारी?

सूत्र बताते हैं कि कई जगहों पर लगाए गए तथाकथित नि:शुल्क शिविरों में व्यवस्थाएं नाम मात्र की होती हैं, डॉक्टर कम- प्रचार ज्यादा, मरीज कम- मंच और माइक ज्यादा, इलाज से ज्यादा इंस्टाग्राम फेसबुक के लिए रील बनवाना व फोटो सेशन पर ध्यान। यानी सेवा कम और सोशल मीडिया की सुर्खियां ज्यादा?

धर्म और समाज के नाम पर भी एक अलग ही प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। कोई यज्ञ करवा रहा है, कोई संतों के साथ मंच साझा कर रहा है, तो कोई समाज विशेष के नाम पर आयोजन कर अपनी पैठ बनाने में जुटा है। इन सबके बीच आम जनता समझ नहीं पा रही कि यह निस्वार्थ सेवा है या भविष्य की राजनीतिक निवेश योजना।

राजनीति का यह नया मॉडल भी कम रोचक नहीं है। शुरुआत में ये चेहरे जिले के हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता और आम लोगों से जुड़ने का प्रयास करते हैं। घर-घर निमंत्रण, कार्यक्रमों में भागीदारी और हम आपके अपने हैं का संदेश। लेकिन जैसे ही पहचान और पहुंच बढ़ती है, पुराने लोग धीरे-धीरे किनारे होते जाते हैं और उनकी जगह बड़े चेहरों और प्रभावशाली दिखने वाले लोगों का दायरा बढ़ने लगता है। सबसे ज्यादा सवाल उन समर्पित कार्यकर्ताओं को लेकर उठ रहे हैं, जो वर्षों से जमीन पर संगठन के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों और प्रचार की कमी के कारण पीछे छूटते जा रहे हैं। वहीं बाहर से आए चेहरे सीमित समय में बड़े पद और पहचान हासिल कर लेते हैं।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कई ऐसे प्रयास केवल टिकट की दौड़ का हिस्सा हैं। पहले सेवा, फिर पहचान, फिर संगठन मे स्थान और आखिर में राजनीतिक दावेदारी, यह फॉर्मूला तेजी से अपनाया जा रहा है। व्यंग्य यह है कि सेवा अब साधन नहीं, साध्य बन गई है। और सवाल यह है कि क्या सतना की राजनीति अब बाहरी प्रयोगों का मैदान बनती जा रही है?

संगठन से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना हैं की शीर्ष एवं स्थानीय नेतृत्व और संगठन यह समझें कि जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी और बाहरी चेहरों को बढ़ावा देना कहीं न कहीं जनता के विश्वास को भी प्रभावित कर सकता है। क्योंकि अंततः जनता सब देखती है, सेवा भी, मंशा भी, अब देखना यह होगा कि सतना की जनता इस सेवा की राजनीति को कितनी गंभीरता से लेती है और असली-नकली के बीच फर्क कैसे करती है।

ऐसी चर्चाएं भी जोरों पर.👇

  • त्यौहारों मे शहर के अधिकांश चौराहे उन्ही दिखावे वाले नेताओं के पोस्टरों से चमकते हैं रहते हैं।
  • जेब मजबूत हो तो हर मंच पर मुख्य अतिथि बनने का रास्ता अपने आप खुल जाता है, दान भी उनका, सम्मान भी उनका और सोशल मीडिया पर प्रचार भी उनका!
  • दफ्तरों और घरों में बुलाकर चाय-नाश्ते के साथ फोटो खिंचवाना अब नया जनसंपर्क है, ताकि तस्वीरों में पूरा जिला साथ खड़ा दिखे!
  • मीडिया/सोसल मीडिया में हर दिन दिखना काम का सबूत नहीं, कभी-कभी यह सिर्फ मजबूत प्रबंधन का असर होता है, जहां खबरें भी तय होकर छपती हैं!

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