प्रेमानंद महाराज पर टिप्पणी से मचा बवाल, भक्ति भाव से होती है, भाषा से नहीं, संत समाज एक सुर में बोले, प्रेमानंद ब्रज की शान हैं……
अमित मिश्रा/सतना।

तुलसीपीठाधीश्वर पद्मविभूषण जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा संत प्रेमानंद महाराज पर की गई टिप्पणी ने संत समाज में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है।
रामभद्राचार्य ने कहा था……

अगर प्रेमानंद महाराज में चमत्कार है तो वे मेरे सामने एक अक्षर संस्कृत बोलकर दिखाएं, श्लोक का अर्थ समझाएं। उनकी लोकप्रियता क्षणभंगुर है, वे बालक समान हैं।
इस बयान ने संत जगत को झकझोर दिया। ब्रज, वृंदावन और काशी के संत प्रेमानंद महाराज के समर्थन में खुलकर सामने आ गए।
साधु-संतों की तीखी प्रतिक्रियाएं…
साधक मधुसूदन दास ने कहा…..

भक्ति का भाषा से कोई संबंध नहीं। भगवान भाव देखते हैं, भाषा नहीं। रामभद्राचार्य को अपने ज्ञान का अहंकार हो गया है। प्रेमानंद जैसे दिव्य संत पर ऐसी टिप्पणी निंदनीय है।
संत अभिदास महाराज ने कहा…

प्रेमानंद महाराज कलियुग के दिव्य संत हैं। उन्होंने लाखों युवाओं को सद्मार्ग पर लगाया। उनके लिए अपमानजनक शब्द कहना शोभनीय नहीं।
दिनेश फलाहारी (हिंदू नेता) ने कहा…

इतना घमंड रावण को भी नहीं था। प्रेमानंद महाराज के पास न संपत्ति है, न पाखंड। उनके पास केवल राधा नाम की अपार शक्ति है।
धर्माचार्य अनमोल शास्त्री ने कहा…

प्रेमानंद युवाओं की धड़कन हैं, ब्रज की शान हैं। घमंड किसी संत को शोभा नहीं देता।
आचार्य रामविलास चतुर्वेदी….

संतों का काम भक्ति और समाज को जोड़ना है, दूसरों को छोटा दिखाना नहीं। आज श्रेष्ठता साबित करने की होड़ चिंताजनक है।
साध्वी दिव्या किशोरी ने कहा.….

प्रेमानंद महाराज की ख्याति विश्वभर में है। उनके रोम-रोम में राधारानी का वास है। बड़े संतों का इस तरह बोलना समाज को गलत संदेश देता है।
छोटे संत का बड़ा समर्थन…

श्रृंग्वेरपुर धाम, प्रयागराज के 5 वर्षीय बाल संत राम श्रीश बाहुबली महाराज ने भी प्रेमानंद के पक्ष में कहा, गुरु पर प्रश्नचिह्न उठाना अनुचित है। प्रेमानंद जी की कृपा से ही मेरी जान बची। वे राधा नाम में लीन दिव्य संत हैं।
प्रेमानंद महाराज की पहचान
- युवाओं के मार्गदर्शक – बुराई से हटाकर सद्मार्ग पर लाने वाले संत।
- पाखंड से दूर – न संपत्ति, न दिखावा; केवल भक्ति और राधा नाम।
- विश्व ख्याति – लाखों-करोड़ों भक्तों के हृदय में बसे संत।
संत समाज का एक सुर है कि भक्ति भाव से होती है, भाषा से नहीं। प्रेमानंद महाराज आज समाज और युवाओं के लिए प्रेरणा हैं। उनके प्रति अपमानजनक टिप्पणी करना न केवल अनुचित है बल्कि संत परंपरा के विरुद्ध भी है।