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मैहर में प्रदर्शन के दौरान बड़ा हादसा: पुतला दहन में भड़की आग, ट्रैफिक टीआई विक्रम सिंह पाठक झुलसे, ICU में भर्ती…..

आदित्य मिश्रा……आंचलिक डेस्क।

मैहर में आज शुक्रवार सुबह करीब 9:30 बजे राजनीतिक प्रदर्शन उस समय हादसे में बदल गया, जब पुतला दहन के दौरान अचानक आग भड़क उठी और ड्यूटी पर मौजूद ट्रैफिक टीआई विक्रम सिंह पाठक इसकी चपेट में आ गए। गंभीर रूप से झुलसे टीआई को तत्काल सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें आईसीयू में रखा गया है।

यह प्रदर्शन प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ आयोजित किया गया था। मंत्री द्वारा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी। प्रदर्शन का नेतृत्व कांग्रेस जिलाध्यक्ष धर्मेश घई कर रहे थे। कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति ली गई थी और सुबह 9 बजे प्रदर्शन प्रस्तावित था।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब प्रदर्शनकारी पुतला दहन कर रहे थे, उसी दौरान पुलिस बल व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास कर रहा था। टीआई विक्रम सिंह पाठक मौके पर हालात नियंत्रित कर रहे थे, तभी अचानक आग तेज हो गई और उनकी वर्दी ने आग पकड़ ली। आग लगते ही मौके पर अफरा-तफरी मच गई। साथी पुलिसकर्मियों ने तत्काल उन्हें घेरकर आग बुझाने की कोशिश की और गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचाया।

मैहर के सिविल अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, टीआई की कमर, पीठ, जांघ और हाथ गंभीर रूप से झुलसे हैं। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया है। उनकी स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। जरूरत पड़ने पर उन्हें जिला अस्पताल या जबलपुर रेफर किए जाने की संभावना भी जताई गई है।

घटना के बाद मैहर एसपी ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पेट्रोल जैसे ज्वलनशील पदार्थों का उपयोग अत्यंत खतरनाक है। इससे न केवल कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि आम नागरिकों और ड्यूटी पर तैनात कर्मियों की जान भी जोखिम में पड़ती है। पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई की बात कही है।
प्रदर्शन के बीच हुए इस हादसे ने सुरक्षा व्यवस्थाओं और विरोध प्रदर्शनों के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मैहर के यातायात प्रभारी विक्रम पाठक का बुरी तरह झुलस जाना केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी प्रशासनिक और राजनीतिक संस्कृति पर गंभीर सवाल है। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अधिकार है, पर क्या उसका स्वरूप इतना उग्र और असंयमित हो जाए कि किसी अधिकारी की जान जोखिम में पड़ जाए? कभी सत्ता पक्ष तो कभी विपक्ष.. सड़क पर आक्रोश की आग भड़कती है, लेकिन उसकी लपटें किसे जला देंगी, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम थे? क्या भीड़ प्रबंधन की ठोस रणनीति बनाई गई थी? यह घटना चेतावनी है कि विरोध की राजनीति और प्रशासनिक तैयारी, दोनों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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