छूट गया अपनों का सहारा, लापरवाही ने लील ली गरीब की जान…..
अमित मिश्रा /सतना।

किसे फर्क पड़ता है जब एक मजदूर मरता है.!
कौन समझेगा ऐसी पीड़ा.!
शहर की भीड़भाड़ और विकास के शोर में एक गरीब की मौत की चीख दब गई, वो भी किसी हादसे में नहीं बल्कि सिस्टम की बेरहमी, ठेकेदारों की लापरवाही और जिम्मेदारों की चुप्पी में।
नाम था संतकुमार कुशवाहा, जिसे सब अमित कहकर बुलाते थे, रोज की तरह उस दिन भी घर से निकले थे, हाथ में फावड़ा, माथे पर पसीना और आंखों में बच्चों के सपनों की चमक… पर इस बार वह लौटकर नहीं आए… क्योंकि सीवर की गहराई ने एक बाप, एक पति, एक बेटे को हमेशा के लिए निगल लिया।
अब वो घर जहां कभी बच्चों की खिलखिलाहट गूंजती थी, वहां मातम पसरा है।
पत्नी सुहाग खो चुकी है, छोटे-छोटे बच्चे पापा कहकर पुकारते हैं तो दीवारें जवाब नहीं देतीं, और बूढ़े मां-बाप की आंखों में बस नमी बची है।
एक हादसे ने सब कुछ छीन लिया, वो सहारा, वो साया, वो जीवन।
यह कोई पहली मौत नहीं थी, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी शहर चुप है।
विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले नेता, गरीबों के हितैषी बनने वाले मंत्री और प्रशासन सब मौन हैं!
न कोई बड़े साहब संवेदना जताने आऐ, न किसी बड़े नेता ने घर पहुंचकर दिलासा दिया।
क्यों?
क्योंकि मरने वाला गरीब था… किसी बड़ी गाड़ी का मालिक नहीं, किसी कुर्सी पर बैठा अफसर नहीं।
लोग कहते हैं अगर यही हादसा किसी रसूखदार के साथ हुआ होता तो शहर की सड़कें कैंडल मार्च से भर जातीं, नारे लगते न्याय चाहिए… लेकिन गरीब की मौत? बस एक खबर बनकर रह जाती है।
नगर निगम और ठेकेदारों की लापरवाही से फिर एक जिंदगी खत्म हो गई।
बिना ऑक्सीजन, बिना सुरक्षा उपकरण, बिना प्रशिक्षण, मज़दूरों को आज भी मौत के मुंह में धकेला जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश कागजों में सजे हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई सीवर की गहराई में लाश के रूप में सामने है।
मशीनों से सफाई के दावे हवा में हैं, और गरीब मज़दूर अब भी अपने हाथों से कचरा साफ करते-करते खुद मिट जाते हैं।
क्या प्रशासन की जिम्मेदारी इतनी सस्ती है?
क्या कुछ मुआवज़ा एक जिंदगी की कीमत चुका सकता है?
क्या उस बच्चे की आंखों से बाप की याद मिट जाएगी, जो रोज दरवाजे पर बैठा उसका इंतज़ार करता था?
क्या उस औरत का दर्द कम हो जाएगा, जिसने अपनी जिंदगी के हर सुख-दुख में उस आदमी का साथ पाया था?
संतकुमार कुशवाहा अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं, एक ऐसे इतिहास का, जहां गरीब मरते हैं और जिम्मेदार बेशर्मों की तरह आंखें फेर लेते हैं।
उनकी मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि इस व्यवस्था की लाचारी की गवाही है।
आज वक्त है सवाल पूछने का….
कब तक मजदूर मरते रहेंगे सीवरों में?
कब तक उनके बच्चों को अनाथ बनाकर जिम्मेदार बच निकलेंगे?
कब तक विकास की चमक इन गरीबों के लहू से रोशन होती रहेगी?
अब शब्दों से नहीं, जवाबदेही से बदलाव चाहिए।
ठेकेदारों और अफसरों पर सख्त कार्रवाई हो, सीवर सफाई में मशीनों का उपयोग अनिवार्य बने, और हर मजदूर को सुरक्षा, बीमा और सम्मान का अधिकार मिले।
क्योंकि संतकुमार सिर्फ एक नाम नहीं,
वो हर उस मजदूर का प्रतीक है जो शहर को साफ रखता है,
लेकिन खुद गंदगी और लापरवाही के अंधेरे में मर जाता है, और जब कोई संतकुमार मरता है, तो सिर्फ एक मजदूर नहीं, पूरी इंसानियत मर जाती है…..
व्यक्तिगत लेख…..
अमित मिश्रा….
संपादक, रेवांचल रोशनी न्यूजपेपर।
एवं रिपोर्टर सहारा समय न्यूज़ चैनल।