नागौद की राजनीति का एक युग समाप्त : संघर्ष, साहस और बेबाकी की पहचान थे यादवेंद्र सिंह………

नागौद की राजनीति में अपनी कड़क शैली, बेबाक स्वभाव और अन्याय के खिलाफ खुलकर लड़ने के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व विधायक यादवेंद्र सिंह कचनार का निधन क्षेत्र के लिए एक बड़ी क्षति के रूप में देखा जा रहा है। उनके जाने के साथ ही नागौद की राजनीति का वह दौर मानो समाप्त हो गया, जिसमें नेता अपने दमखम, स्पष्टवादिता और जनता के भरोसे पर खड़े दिखाई देते थे।
कहा जाता था कि जहां कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता था, वहां यादवेंद्र सिंह खड़े हो जाते थे। दबंग तेवर, साफ-साफ बात कहने की आदत और जनता के मुद्दों पर खुलकर संघर्ष करना ही उनकी असली पहचान थी। जिले भर में उन्हें स्पष्टवादी और संघर्षशील नेता के रूप में जाना जाता था।
5 जून 1953 को सतना जिले के कचनार गांव में जन्मे यादवेंद्र सिंह ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1978 में वसुधा ग्राम पंचायत के सरपंच के रूप में की। इस चुनाव में उन्होंने जुगुल किशोर बागरी को पराजित कर राजनीतिक जीवन का पहला कदम रखा। लगातार 10 वर्षों तक सरपंच रहते हुए उन्होंने गांव के विकास और जनहित के कई कार्य किए, जिससे वे धीरे-धीरे क्षेत्र की राजनीति में मजबूत पहचान बनाने लगे।
सरपंच कार्यकाल के बाद 1992 में वे विपणन सहकारी समिति नागौद के अध्यक्ष बने, लेकिन अगले ही वर्ष उन्होंने यह पद छोड़कर जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष का दायित्व संभाला। 1998-99 में कृषि उपज मंडी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने किसानों और व्यापारियों के हितों के लिए सक्रिय भूमिका निभाई और लगभग पांच वर्षों तक मंडी का नेतृत्व किया।
राजनीतिक सफर आसान नहीं था। 2003 और 2008 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष नहीं छोड़ा। 2013 में कांग्रेस ने उन्हें पुनः मौका दिया और वे विधायक निर्वाचित हुए। विधायक रहते हुए पांच वर्षों तक उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया।
2018 के विधानसभा चुनाव में वे लगभग 1200 वोटों के मामूली अंतर से चुनाव हार गए। वर्ष 2023 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ा और करीब 52 हजार वोट हासिल किए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।
पिछले कुछ समय से वे गंभीर रूप से अस्वस्थ थे। उनकी हार्ट बाईपास सर्जरी हो चुकी थी और वे लंबे समय से हाई डायबिटीज से भी पीड़ित थे। तीन दिन पहले संक्रमण बढ़ने के कारण चिकित्सकों को उनका घुटने के नीचे से एक पैर काटना पड़ा, जिसके बाद उनकी हालत और बिगड़ गई। भोपाल में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
अपने पीछे वे पत्नी प्रभा सिंह, पुत्र यतेंद्र सिंह उर्फ पप्पू और भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी बहू प्रतिभा सिंह वर्तमान में नगर परिषद नागौद की अध्यक्ष हैं, जबकि पुत्र यतेंद्र सिंह जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं।
यादवेंद्र सिंह केवल राजनीति करने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि जनता के बीच खड़े रहने वाले नेता थे। उनके व्यक्तित्व में साहस, स्पष्टवादिता और संघर्ष की अद्भुत मिश्रण दिखाई देता था।
आज उनके जाने से नागौद की राजनीति में एक ऐसी रिक्तता बन गई है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। कचनार का यह दबंग नेता भले ही आज इस दुनिया में न रहा हो, लेकिन उसका संघर्ष, उसकी बेबाक आवाज और जनता के लिए खड़ा होने का साहस लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगा।
लोगों का कहना है…. यह सिर्फ एक नेता का निधन नहीं, बल्कि नागौद की राजनीति के एक दौर का अंत है।