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अमिलपुर में प्रभातफेरी बनी संस्कार और संगठन का सशक्त माध्यम…….

जैतवारा/सतना। जहाँ आधुनिक जीवनशैली ने लोगों की दिनचर्या से भक्ति और अनुशासन को लगभग दूर कर दिया है, वहीं अमिलपुर गांव ने एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। यहाँ प्रतिदिन सुबह प्रभातफेरी निकलती है, जो न केवल ईश्वर-भक्ति का माध्यम है, बल्कि सामाजिक संगठन, संस्कार और नई पीढ़ी को दिशा देने का सशक्त प्रयास भी बन चुकी है।

प्रतिदिन सुबह ठीक 5 बजे पंडित वाल्मीकि तिवारी के घर स्थित मंदिर के समीप सैकड़ों श्रद्धालु, युवा, बुजुर्ग और बच्चे एकत्रित होते हैं। ढोलक की थाप पर…. गौरी शंकर सीताराम-पार्वती शिव सीताराम…. जैसे भजनों के साथ प्रभातफेरी पूरे गांव का भ्रमण करती है, लगभग आधे घंटे बाद 5:30 बजे यह फेरी भगवान के जयकारों के साथ वहीं समाप्त होती है।


युवाओं का कहना है कि दिनभर खेती, व्यवसाय और अन्य कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद वे दिन की शुरुआत ईश्वर-स्मरण से करना चाहते हैं, लगभग छह माह पहले मात्र दस युवाओं से शुरू हुई यह पहल आज पूरे गांव का उत्साह बन चुकी है, गांव के लोग बताते हैं कि प्रभातफेरी की आवाज से अधिकांश लोग 4:30 से 5 बजे के बीच जाग जाते हैं, जो लोग फेरी में शामिल नहीं हो पाते, वे घर के बाहर आकर प्रणाम करते हैं।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं.. युक्ताहारविहारस्य… योगो भवति दुःखहा,
अर्थात संयमित दिनचर्या ही जीवन के दुःखों का नाश करती है….

अमिलपुर की प्रभातफेरी इसी संयम और अनुशासन का जीवंत उदाहरण है, रामायण में भी प्रभु श्रीराम ने प्रातःकालीन भक्ति और कर्तव्य को सर्वोपरि बताया है,
यह पहल बच्चों के लिए भी प्रेरणास्रोत है, प्रभातफेरी के कारण बच्चे समय पर उठकर पढ़ाई शुरू करते हैं, गांव के लोग मानते हैं कि इससे आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक एकता भी मजबूत हुई है,
जैतवारा नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक एक और दो में बसे अमिलपुर, जिसे अमिलपुर ब्राह्मण गांव भी कहा जाता है, अपनी धार्मिक परंपराओं और सती माता के आशीर्वाद के लिए भी जाना जाता है। चंद लोगों से शुरू हुई यह प्रभातफेरी आज पूरे गांव को जोड़ने वाली आध्यात्मिक धारा बन चुकी है, जो नई पीढ़ी को संस्कार, अनुशासन और भक्ति का संदेश दे रही है……

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