बिना साइकिल चले टूटा साइकिल ट्रैक, कौन देगा हर्जाना?……
अमित मिश्रा/सतना………..

सतना का हाल बेहाल, सवालों के घेरे में सिस्टम…………
साइकिल ट्रैक से स्ट्रीट लाइट तक, करोड़ों खर्च पर भी जिम्मेदारी तय नहीं………..
सतना। स्मार्ट सिटी के नाम पर शहर में हो रहे विकास कार्यों की हकीकत अब खुद सवाल बनकर खड़ी हो रही है, पन्ना नाका क्षेत्र में करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए साइकिल ट्रैक को हाल ही में बिना किसी लिखित आदेश के तोड़ दिया गया, बताया जा रहा है कि नगर निगम के इंजीनियर, यातायात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में महज मौखिक निर्देश पर इस ट्रैक को मोटर व्हीकल के लिए खोल दिया गया, जिस साइकिल ट्रैक पर कभी मोटर वाहनों के लिए जुर्माने का प्रावधान था, वही ट्रैक अब सामान्य सड़क में तब्दील कर दिया गया, सवाल उठता है, इस नुकसान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
हकीकत यह भी है कि जिस साइकिल ट्रैक का उद्देश्य साइकिल सवारों को सुरक्षित मार्ग देना था, उस पर कभी साइकिल चल ही नहीं पाई, वहां सब्जी दुकानें, पंचर की दुकानें, ठेले और अन्य अस्थायी व्यवसाय पहले से संचालित थे, यानी योजना बनी, पैसा खर्च हुआ, लेकिन ज़मीन पर उसे लागू करने की गंभीर कोशिश नहीं हुई, अब जब ट्रैक तोड़ दिया गया, तो जनता पूछ रही है, क्या यह सीधे तौर पर सार्वजनिक धन की बर्बादी नहीं है?

यह पहला मामला नहीं है। शहर के रेलवे ब्रिज और सेमरिया चौक पर हर कुछ दिनों में नई लाइटें लगाई जाती हैं, जो चंद दिनों में बंद हो जाती हैं, फिर दोबारा नई लाइटें लगती हैं और वही कहानी दोहराई जाती है, आखिर ये लाइटें किस कंपनी की हैं, उनकी मॉनिटरिंग कौन करता है और खराब होने पर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती, यह सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
सड़क निर्माण का हाल भी अलग नहीं है, आज सड़क बनती है, कल सीवर या गैस लाइन के नाम पर खुद जाती है, फिर दोबारा निर्माण होता है, यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, बरसात के दौरान शहर की हालत किसी से छिपी नहीं, गड्ढों और कीचड़ के बीच जनता मजबूरन निकलती रही, आज भी कोतवाली से स्टेशन रोड तक का सफर आसान नहीं है, बाजार और गलियों की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सबके बावजूद न तो बड़े अधिकारी खुलकर जवाब देते हैं और न ही जनप्रतिनिधि सड़कों पर उतरकर विरोध करते दिखते हैं, छोटे मामलों पर बयान और निरीक्षण होते हैं, लेकिन शहर के बड़े मुद्दों पर चुप्पी क्यों?
चर्चाएं हैं की अब जनता भी आत्ममंथन करे, क्या विरोध केवल सोशल मीडिया तक सीमित रह जाना काफी है? या फिर संगठित, संवैधानिक और लगातार सवाल पूछना जरूरी है?
आज सतना पूछ रहा है, कौन जिम्मेदार है, कौन जवाब देगा और कब बदलेगा यह सिस्टम?………