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जब मंच पर बैठे नेता की सोच सड़ जाए….

चर्चाओं में फूल सिंह बरैया का विवादित बयान……

मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया का महिलाओं और बलात्कार को लेकर दिया गया बयान केवल अशोभनीय नहीं, बल्कि समाज के लिए गहरा खतरा है।
यह बयान किसी जाति, वर्ग या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि एक व्यक्ति की गंदी, विकृत और अमानवीय सोच को उजागर करता है।
मंच पर बैठा व्यक्ति जब बोलता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, पूरे समाज के सामने एक दृष्टिकोण रखता है, और यही बात इस मामले को बेहद गंभीर बना देती है।

खूबसूरत लड़की दिख जाए तो दिमाग विचलित हो सकता है और रेप हो सकता है- यह कथन अपराध को सामान्य बनाता है और पीड़िता को दोषी ठहराने की सबसे घिनौनी कोशिश है?
यह वही विक्टिम ब्लेमिंग की मानसिकता है, जिसके खिलाफ सभ्य समाज वर्षों से संघर्ष कर रहा है, रेप को विचलन, सुंदरता या धार्मिक निर्देश से जोड़ना न सिर्फ अपराधी को मानसिक छूट देता है, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का सामाजिक सामान्यीकरण करता है।

बरैया का बयान यहीं नहीं रुकता, उन्होंने समाज विशेष की महिलाओं को लेकर जो आपत्तिजनक, अपमानजनक और झूठे धार्मिक तर्क गढ़े, वह न केवल नारी सम्मान के खिलाफ हैं, बल्कि धर्म, संविधान और मानवता- तीनों का अपमान हैं।

धर्मग्रंथों के नाम पर ऐसी गंदी कल्पनाएँ प्रस्तुत करना यह दिखाता है कि समस्या ग्रंथों में नहीं, उनकी दूषित समझ में है, कोई भी धर्म, कोई भी संस्कृति, किसी भी महिला के शोषण को पुण्य या तीर्थ फल नहीं कह सकती।

यह साफ समझना जरूरी है कि बलात्कार आकर्षण का नहीं, बल्कि सत्ता, वर्चस्व और नियंत्रण का अपराध है, मासूम बच्चियाँ, बुजुर्ग महिलाएँ और परिचितों द्वारा किए गए अपराध इस झूठी थ्योरी को बार-बार खारिज करते हैं। फिर भी जब एक विधायक ऐसी बातें कहता है, तो वह समाज को गलत दिशा देता है,
सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक नैतिकता का है, जो दल महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करता है, जिसकी नेता लड़की हूं, लड़ सकती हूं का नारा देती हैं, वहां ऐसे बयानों पर चुप्पी क्यों?
केवल माफी काफी नहीं, समाज यह देखना चाहता है कि क्या राजनीति में ऐसी सोच के लिए कोई जगह नहीं है,
यह लेख किसी जाति या समाज पर आरोप नहीं है… यह स्पष्ट रूप से एक व्यक्ति की गंदी मानसिकता के खिलाफ है, और यह भी स्पष्ट है कि ऐसी सोच हर जाति, हर दल और हर समाज में मिल सकती है- इसलिए इसका विरोध भी सामूहिक होना चाहिए।
जो मंच पर बैठकर स्त्री को डर और दोष का कारण बनाते हैं, उनका सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार होना चाहिए, क्योंकि अगर आज हम चुप रहे, तो कल यही चुप्पी अपराध की सबसे बड़ी सहयोगी बन जाएगी……..

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