सोशल मीडिया का नशा: हर उम्र की ज़िंदगी में सेंध, लाइक्स के लोभ में खोती खुशियाँ, बढ़ते हादसे और टूटते रिश्ते…..

अमित मिश्रा-सतना।

कहानी हर घर की, सुबह उठने से रात तक ऑन रहने की मजबूरी…….
आज लगभग हमारे आपके हर घर की यही कहानी है, नींद खुलते ही मोबाइल हाथ में, और रात को आँख बंद होने तक स्क्रीन से चिपकी ज़िंदगी, 1 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक, सोशल मीडिया का नशा ऐसे हावी हुआ है कि बिना फोन के चैन नहीं मिलता,
रिसर्च कहती है- 21 करोड़ भारतीय सोशल मीडिया के आदती बन चुके हैं। यह सिर्फ आदत नहीं, एक धीमी और खतरनाक लत है।
इससे नफ़ा कम, नुकसान बेहिसाब हैं।
छोटे बच्चों से बुजुर्ग तक कैसे फैल रहा है स्क्रीन, नशा…..
1 साल के बच्चों तक को चुप कराने के लिए फोन दिया जाता है, कई परिवार छोटे बच्चों को रोना बंद कराने के लिए ऐसा करते हैं…
परिणाम… भाषा सीखने की क्षमता प्रभावित, चिड़चिड़ापन, नींद की गड़बड़ी, आंखों की रोशनी पर असर….
रील्स में परफेक्ट दिखने का दबाव, लाइक्स के अंकों में खुशी ढूंढना, और वर्चुअल दुनिया में मान्यता पाने की भूख…
बच्चे छोड़िये बुजुर्ग भी नहीं बचे रिश्तों से दूर, अकेलेपन से घिरे बुजुर्ग भी घंटों मोबाइल में रम जाते हैं, सच यह है कि सोशल मीडिया उनका साथी बन गया है, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें और अकेला कर रहा है….
कई जगह मोबाइल न देने पर हादसे, कड़वी हकीकत के उदाहरण…
सोशल मीडिया सिर्फ समय नहीं खा रहा, कई बार जानलेवा भी साबित हो रहा है।
1. आमेर, राजस्थान-
पिताजी हाथी की सवारी पर चढ़ते ही चक्कर खा गए, बेटे-बहू ने मदद करने के बजाय रील बनाकर पोस्ट डाल दी, रिश्तों की गर्माहट वायरल कंटेंट की भेंट चढ़ गई,
2. गोवा- फोन गया पर कंटेंट नहीं
लहर आने से युवती का फोन समंदर में डूब गया।
दूसरा फोन निकालकर पोस्ट डाली,
फोन गया, पर कॉन्टेंट नहीं रुक सकता, नया आइफोन बुक, एक हादसा भी ‘कन्टेंट क्रिएशन’ की खुराक बन गया,
3. लखनऊ-एक्सीडेंट के बाद भी लाइव
कार पलटी,
युवक घायल,
लेकिन एंबुलेंस बुलाने से पहले LIVE शुरू,
भाई, एक्सीडेंट हो गया… सब ठीक है… थोड़ा ब्लड है बस,
1200 लोग देख रहे थे,
यह दृश्य बताता है, लाइक्स का नशा दर्द को भी दबा देता है,
सतना में भी एक नेता जी का बीते दिनो एक्सीडेंट हुआ था, उन्होंने भी कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी गाड़ी की व अपनी फोटो भेजी थी मेरी दुर्घटना हो गई…..
छोटा फायदा, बड़ा नुकसान, सोशल मीडिया ने क्या छीना?
फायदा (बहुत कम)
जानकारी तक पहुंच, दूर के रिश्तों से संपर्क, अवसर (पर यह भी सीमित)
नुकसान (बहुत बड़े और गंभीर)
नींद की गड़बड़ी, चिंता, डिप्रेशन, रिश्तों में दूरी, बच्चों की सीखने की क्षमता पर असर, लगातार तुलना में जीना, असल जीवन से कटाव, सड़क हादसे, घर की दुर्घटनाएं, मानसिक थकान,
सोशल मीडिया हमें जोड़ने नहीं, अकेला करने लगा है
एक समय था जब परिवार साथ बैठकर बात करते थे, आज साथ बैठे भी लोग स्क्रीन के भीतर खोए रहते हैं…
प्रियजन की मौत के कुछ मिनट बाद ही पोस्ट, फोटो या स्टोरी डाल देना…
संवेदनाओं का खोना…
यह सब दर्शाता है कि
रीयल लाइफ की भावनाओं पर वर्चुअल दुनिया भारी पड़ गई है।
जागरूक बनिए बनाइये, घर में नो-पोस्ट डे जैसी पहल अपनाइए…….
कई परिवार हर रविवार सोशल मीडिया से दूरी बनाकर नो-पोस्ट डे’मनाते हैं,
नतीजा- बेहतर बातचीत, मानसिक शांति, और साथ रहने का असली आनंद,
अंत में- सवाल हम सबके लिए
क्या हम सोशल मीडिया चला रहे हैं
या सोशल मीडिया हमें चला रहा है?
लाइक्स का दबाव, फॉलोअर्स की भूख और हर पल परफेक्ट दिखने की चाह…
क्या यह ज़िंदगी है या एक अंतहीन प्रदर्शन?
अब समझना होगा,
मोबाइल हमारा साथी बने, मालिक नहीं।
समय है जागने का,
समय है खुद को आज़ाद करने का, सोशल मीडिया की बेड़ियों से…..